जेनजी– विद्रोह ने पहचानवादी नेतृत्व को किया तेतर बिखराः आंदोलन गहरे संकट में

 




काठमांडू। विराटनगर, तप्लेजंग और पंचथर में 23–24 भदौ के दौरान हुए जन–आंदोलन के बाद पहचान आधारित राजनीति की दिशा एक बार फिर बदलती दिख रही है। पहचान आंदोलन के कई नेता अपने मूल एजेंडे को पीछे छोड़ते हुए पारंपरिक बड़ी पार्टियों और उभरती नई राजनीतिक शक्तियों की ओर झुक रहे हैं। इससे आंदोलन का नेतृत्व बिखरने लगा है और पहचानवादी राजनीति एक बार फिर संकट में नजर आ रही है।


पहचान की राजनीति में उभार, संघर्ष और फिर नेताओं के रास्ते बदलने का यह चक्र वर्षों से दोहराया जा रहा है। आंदोलन को आगे बढ़ाने वाले कई चेहरे सत्ता और अवसरवाद के दबाव में मूल मुद्दों से दूर होने लगे हैं। क्षेत्रीय और पहचान केंद्रित दलों में सक्रिय नेतृत्व का टूटना साफ तौर पर देखा जा सकता है।


इसी कड़ी में जातीय पहचान और स्वायत्तता के मुद्दे पर लंबे समय से संघर्षरत रहे दाकेंद्र सिंह थेगिम हाल ही में कुलमान घीसिंग के नेतृत्व वाली उज्जयालो नेपाल पार्टी में शामिल हुए हैं। उनका कहना है कि वर्तमान राजनीतिक परिस्थिति में केवल पहचान के मुद्दे पर राजनीति संभव नहीं है, इसलिए उन्होंने “व्यापक दृष्टि” वाली पार्टी का विकल्प चुना है।


थेगिम का दावा है कि उन्होंने अपने मूल एजेंडे से कोई समझौता नहीं किया है। उन्होंने कहा—

“जहाँ भी पहचान, समावेशी लोकतंत्र, अनुपातिकता और बहुसांस्कृतिकता के सिद्धांत मौजूद होंगे, मैं वहीं रहूँगा। उज्जयालो पार्टी के कानून और घोषणापत्र में यही बातें शामिल हैं। अब प्रांत का नाम बहु–पहचान के आधार पर तय होना चाहिए।”


उधर, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नेतृत्व की यह बिखरन पहचान आंदोलन की शक्ति को कमजोर कर रही है और वर्षों से चले संघर्ष की उपलब्धियां खतरे में पड़ सकती हैं।


पहचान के सवाल पर संगठित रहना—आज आंदोलन के सामने यही सबसे बड़ी चुनौती बन गया है।




Post a Comment

0 Comments
* Please Don't Spam Here. All the Comments are Reviewed by Admin.